भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अहि पार गँगा बहै ओहि जमुना, बीचे दियर परि गेल हे / अंगिका लोकगीत

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

अहि[1] पार गँगा बहै[2] ओहि[3] जमुना, बीचे दियर[4] परि गेल हे।
ओहि दियर पर जोगी एक आयल, जटा देल उरमाय हे॥1॥
घर सेॅ बाहर भेली बेटी दुलारी बेटी, परि गल जोगी मुख डीठ[5] हे।
हाली हाली[6] आहो जोगी बँसबा कटाब हो, झटपट देहो न ओहार हे॥2॥
एक कोस गेल धिआ दुइ गोस गेल, तीजे[7] कोस बाबा के पोखरि हे।
घोड़बा चढ़ल आबै भैया सहोदर, परिगेल जोगी मुख डीठ हे॥3॥
अहि खड़ग मारब जोगिया तपसिया, बहिनी के आनब छोड़ाय हे।
डलिया सेॅ बोलै बहिनी दुलारी बहिनी, सुनु भैया अरज हमार हे॥4॥
तोहरा के लिखल भैया बाबा के संपतिया, हमरा के जोगिया भिखारि रे॥5॥

शब्दार्थ
  1. इस पार
  2. बहती है
  3. उस पार
  4. दियारा; नदी द्वारा छोड़ी हुई जमीन
  5. दृष्टि
  6. जल्दी-जल्दी
  7. तीसरे