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अ-विभाज्य / बाबुषा कोहली

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तुम दो महाद्वीपों में बाँटा हुआ इस्ताम्बुल शहर हो
एक बार कहा था मैंने इस पर शर्मिंदा हूँ

तुम्हारी ऊंगलियों की पोरों पर लहलहाती हैं फसलें
गालों पर बहती हैं प्रचंड नदियाँ

बाँध ढह जाते हैं
छाती में नगर फैलते हैं फूलते हैं
तुम्हारी आाँखों में डूब जाती हैं महान सभ्यताएँ

जीने के लिए जितना चाहिए
उससे कहीं ज्यादा लोहा बहता है तुम्हारी नसों में
पसीने में चिपकता है नमक
मिटटी में सोंधा सा महकता है

तुम
दरअसल एक सौ छियानवे हिस्सों में बंटा हुआ पृथ्वी ग्रह हो

आाँखों की पुतलियाँ पीछा करती हैं हर दिशा में आकाश का
हर क्षण तीन गुना बढ रहा आकाश
काट–छाँट कर समोता है स्वयं को पुतलियों में ठसाठस
आकाश का लह गालों पर टपकता है

आँख आँख में भरा हूँ मैं अविभाज्य आकाश हूँ