आँखे अब पथरायी है बन्द दरीचे खोलो हो
काहे इतना ज़ुल्म किये हो कुछ तो बोलो हो
चाँद भी मद्धम तारे रोये गम का अन्धेरा और बढ़ा
रात तो सारी गुज़र गई है कुछ लम्हा तो सो लो हो
शाम उफक की लाली है या तेरा जलवा-ए-नाज़ व अदा
मेरी आँखे बरखा खूं है अपनी ज़ुल्फ भिगो लो हो
देखू तुम को शाम व सहर मैं दिल की तमन्ना कुछ ऐसी
आओ तुम भी मयखाने में बन्द ज़ुबा को खोलो हो
कदम-कदम पे रुसवा हुये हो आरिफ होश में आओ तो
दामन पे कुछ दाग लगे है अश्कों से तुम धो लो हो