भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आँधियों में भी न चूके ज़ुल्म से लम्बे दरख़्त / ओम प्रकाश नदीम

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आँधियों में भी न चूके ज़ुल्म से लम्बे दरख़्त ।
जब गिरे तो, दूसरों को ले मरे लम्बे दरख़्त ।

दूब सब्ज़ा, तुन्द तूफ़ानों में भी, बेफ़िक्र था,
कुछ हवा सनकी तो काँपे खौफ़ से लम्बे दरख़्त ।

डूबने वाले का बन जाता है तिनका आसरा,
देखते रहते हैं साहिल पर खड़े लम्बे दरख़्त ।

आशियाने तो न जाने कब से जलते आए हैं,
आज तक ऐ बिजलियो कितने जले लम्बे दरख़्त ।

धूप उन मासूम सब्ज़ों की ये खाते हैं ’नदीम’
जिनमें पल-बढ़ कर हुए इतने बड़े लम्बे दरख़्त ।