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आंचर छोरि अंटारी मां चढ़ि / बघेली

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बघेली लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

आंचर छोरि अटारी मां चढ़ि गई तपै लागीं राम रसोई जी
जो सुधि आई अपने प्रभू जी के मरै विसूरि विसूरि जी
काहेन कै मैं कगदा बनाऊं काहेन कै मसि लेउं जी
आंचर फारि मैं कगदा बनाऊं नैनन कै मसियानी जी
अंगुरी काटि मैं कलम बनाऊं लिखि देउं दुइ दुइ बोल जी
कयथ बैटउना लहुर देवरवा वहै चिठिया लिखि देय जी
हरि जी का पाला है रे सुगना वहै चिठिया लै के जाय जी
लै कै चिठिया कदंब चढ़ि बैठा बोलै लाग बचन सुहात जी
ओही तरी हरि मोर पांसा जो खेलइ चिठिया गिरी छहराय जी
चिठिया जो बाचिनी मन मुसिकियाने असुवन की झरि लाग जी
दै हो साहेब हमरी नौकरिया आजु घरै हम जाब जू
आजु न देबइ काल्हि न देबइ परसों देबइ चुकाइ जी
अगिया लगै तोरे आजु औं काल्हिन बजुर परे तोरे परसों जी
दै देउं साहेब हमरी नौकरिया आजु घरे हम जाब जू
माया मोरी लाई बैठइ का पिल्हुड़िया बहिनी गंगा जल पानी जू
बहिनी तुहिन मोरी बहिनी गोरी धन देआ बताइ जी
तुम्हरी धनिया ताल गई ती होंई लगावै बड़ी देर जी
ताला के ईरे तीरे घोड़ कुदावें गोरी धना कतहूं न देखानी जी
बहिनी तुहिन मोरी बहिनी मोरी गोरी धना दे हो बताइ जी
तुम्हरिन धनिया कुंअना गई ती होई लगावैं बड़ी देर जी
कुंअना के ईरे तीरे घोड़िला कुदावैं गोरी धना कतहूं न देखानि जी
बहिनी तुहिन मोरी बहिनी मोरी गोरी धना दे हो बताइ जी
तुम्हरिन धनिया बागा गई ती बगिया लगावैं बड़ी देर जी
बागा के तरे तरे घोड़िला कुदावैं गोरी धना कहूं न देखानी जी
बहिनी तुहिन मोरी बहिनी मोरी गोरी धना दे हो बताइ जी
तुम्हारी धना नैहर गई ती होई लगावैं बड़ी देर जी
सारी देख्यों सरहज जो देख्यों गोरी धना कहूं न देखानी जी
बहिनी तुहिन मोरी बहिनी मोरी गोरी धना दे हो बताइ जी
आंचर छोरि अटारी मां चढ़ि गई तपैं लागी राम रसोई जी
जो सुधि आई अपने प्रभू जी की मरी बिसूरी बिसूरि जी