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आओ इस उम्र के दरख़्त के साए में बैठें हम तुम / आनंद खत्री

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आओ इस उम्र के दरख़्त के साये में बैठें हम-तुम
ज़िन्दगी मेरी दराज़ में बंद है
और घड़ी फ़ुज़ूल घूम रही है
एक उम्र का पेड़ है बादलों से लदा
मेरी खिड़की पे थोड़ा सा झुका
रात चादर से लिपटी सोई है
और मन बेचैन सपनों के साथ खेल रहा है।

इस उम्र की पत्तियों की सरसराने की आवाज़
अकेले में ही सुनाई देती है
कुछ हसीं ख़्वाब हैं बेदर्द इतने
यादों की मिट्टी पे निशाँ छोड़ गए हैं
कभी गुज़रना इस राह तो थोड़ा रुकना
तुम्हारे साये से ज़मी को नमी मिलती है।

मेरे स्याही से लदे शब्द कालिक नहीं हैं
ये ख़्वाबों के बही खाते हैं
यहाँ सूद पे सूद चड़ता है
और हक़ीक़त चाहे कितना भी क़र्ज़ चुकाये
ख़्वाबों का खाता बना ही रहता है
कभी मिटटी फिर खिली,
तो सारा आसमान खरीद लेंगे।

इस बात पर दर्द कभी न रश्क करे
कि तुम, तुम नहीं और हम, हम नहीं रहे
जो ज़िन्दा हैं, वो ही तो हैं बदलते
साये में तो रंग भी ढक जाते हैं
ये तो मिट्टी है कभी भी खिल जाती है
तुम अपनी मुस्कराहटों को बचा के रखना।