भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें / साहिर लुधियानवी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

यदि इस वीडियो के साथ कोई समस्या है तो
कृपया kavitakosh AT gmail.com पर सूचना दें

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन[1] दौर[2] की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र[3] फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम[4] उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र

ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब
मेराज-ए-फ़न[5] के ख़्वाब, कमाल-ए-सुख़न[6] के ख़्वाब

तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी[7] के, फ़रोग़-ए-वतन[8] के ख़्वाब
ज़िन्दाँ[9] के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन[10] के ख़्वाब

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल[11] के असास[12] थे
ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयात[13]
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-सन्ग[14] है हयात

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

शब्दार्थ
  1. कठिन
  2. समय
  3. सारी उम्र
  4. तेज़ चलने वाली
  5. कला की उँचाई तक पहुँचना
  6. बेहतरीन कविता
  7. जीने की कला
  8. देश का विकास
  9. जीवन
  10. फ़ाँसी तक जाने वाला रस्ता
  11. साकार करना
  12. नींव
  13. जीवन
  14. पत्थर के नीचे हाथ दब जाना (मजबूरी)