भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आख़िरी मुलाक़ात / अख़्तर-उल-ईमान

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आओ कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत [1]मनाएँ हम

आती नहीं कहीं से दिल-ए-ज़िन्दा की सदा
सूने पड़े हैं कूचा-ओ-बाज़ार इश्क़ के
है शम-ए-अंजुमन का नया हुस्न-ए-जाँ गुदाज़[2]
शायद नहीं रहे वो पतंगों के वलवले[3]
ताज़ा न रख सकेगी रिवायात-ए-दश्त-ओ-दर
वो फ़ित्नासर[4] गए जिन्हें काँटें अज़ीज़ थे

अब कुछ नहीं तो नींद से आँखें जलाएँ हम
आओ कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत मनाएँ हम

सोचा न था कि आएगा ये दिन भी फिर कभी
इक बार हम मिले हैं ज़रा मुस्कुरा तो लें
क्या जाने अब न उल्फ़त-ए-देरीना[5] याद आए
इस हुस्न-ए-इख़्तियार पे आँखें झुका तो लें
बरसा लबों से फूल तेरी उम्र हो दराज़
संभले हुए तो हैं, पर ज़रा डगमगा तो लें ।


उर्दू से लिप्यंतर : लीना नियाज

शब्दार्थ
  1. प्रेम की मृत्यु का महोत्सव
  2. पिघलता हुआ
  3. उत्साह, उमंग
  4. पाग़ल
  5. पुरातन प्रेम