भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

आगरे की ककड़ी / नज़ीर अकबराबादी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पहुंचे न इसको हरगिज काबुल दरे की ककड़ी।
ने पूरब और न पच्छिम, खू़बी भरे की ककड़ी।
ने चीन के परे की और ने बरे की ककड़ी।
दक्खिन की और न हरगिज, उससे परे की ककड़ी।
क्या खू़ब नर्मो नाजुक, इस आगरे की ककड़ी।
और जिसमें ख़ास काफ़िर, इस्कन्दरे की ककड़ी।

क्या प्यारी-प्यारी मीठी और पतली पतलियां हैं।
गन्ने की पोरियां हैं, रेशम की तकलियां हैं।
फ़रहाद की निगाहें, शीरीं की हसलियां हैं।
मजनूं की सर्द आहें, लैला की उंगलियां हैं।
क्या खू़ब नर्मो नाजुक, इस आगरे की ककड़ी।
और जिसमें ख़ास काफ़िर, इस्कन्दरे की ककड़ी।

कोई है ज़र्दी मायल, कोई हरी भरी है।
पुखराज मुनफ़अल[1] है, पन्ने को थरथरी है।
टेढ़ी है सो तो चूड़ी वह हीर की हरी है।
सीधी है सो वह यारो, रांझा की बांसुरी है।
क्या खू़ब नर्मो नाजुक, इस आगरे की ककड़ी।
और जिसमें ख़ास काफ़िर, इस्कन्दरे की ककड़ी।

मीठी है जिसको बर्फ़ी कहिए गुलाबी कहिए।
या हल्के़ देख उसको ताज़ी जलेबी कहिए।
तिल शकरियों की फांके, अब या इमरती कहिए।
सच पूछिये तो इसको दनदाने मिश्री कहिए।
क्या खू़ब नर्मो नाजुक, इस आगरे की ककड़ी।
और जिसमें ख़ास काफ़िर, इस्कन्दरे की ककड़ी।

छूने में बर्गे गुल है, खाने में कुरकुरी है।
गर्मी के मारने को एक तीर की सरी है।
आंखों में सुख कलेजे, ठंडक हरी भरी है।
ककड़ी न कहिये इसको, ककड़ी नहीं परी है।
क्या खू़ब नर्मो नाजुक, इस आगरे की ककड़ी।
और जिसमें ख़ास काफ़िर, इस्कन्दरे की ककड़ी।

बेल उसकी ऐसी नाजुक, जूं जुल्फ़ पेच खाई।
बीज ऐसे छोटे छोटे, ख़शख़ाश या कि राई।
देख उसी ऐसी नरमी बारीकी और गुलाई।
आती है याद हमको महबूब की कलाई।
क्या खू़ब नर्मो नाजुक, इस आगरे की ककड़ी।
और जिसमें ख़ास काफ़िर, इस्कन्दरे की ककड़ी।

लेते हैं मोल इसको गुल की तरह से खिल के।
माशूक और आशिक़ खाते हैं दोनों मिलके।
आशिक़ तो हैं बुझाते शोलों को अपने दिल के।
माशूक़ हैं लगाते, माथे पै अपने छिलके।
क्या खू़ब नर्मो नाजुक, इस आगरे की ककड़ी।
और जिसमें ख़ास काफ़िर, इस्कन्दरे की ककड़ी।

मशहूर जैसी हरजा, यां की जमालियां हैं।
वैसी ही ककड़ी ने भी धूमें यह डालियां हैं।
मीठी हैं सो तो गोया, शक्कर की थालियां हैं।
कड़वी हैं सो भी गोया, खू़बां की गालियां हैं।
क्या खू़ब नर्मो नाजुक, इस आगरे की ककड़ी।
और जिसमें ख़ास काफ़िर, इस्कन्दरे की ककड़ी।

जो एक बार यारो, इस जा की खाये ककड़ी।
फिर जा कहीं की उसको हरगिज़ न भाए ककड़ी।
दिल तो ”नज़ीर“ ग़श है यानी मंगाए ककड़ी।
ककड़ी है या क़यामत, क्या कहिए हाय ककड़ी।
क्या खू़ब नर्मो नाजुक, इस आगरे की ककड़ी।
और जिसमें ख़ास काफ़िर, इस्कन्दरे की ककड़ी।

शब्दार्थ
  1. लज्जित