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आजी की कथा / कुमार वीरेन्द्र

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 मैं रोज़-रोज़
माई से, कोई कथा सुनाने की
ज़िद करता, और वह सुनाती, किसी दिन जब नहीं सुनाती
आजी से ज़िद करता वह सुनाए, वह कहती कि मुझे कोई
कथा नहीं आती, कथा तो तोहरी माई को ही
आती है, मैं देखता भी, कि घर में
एक माई ही जो

कथा सुनाती, और हर कथा
गाकर ही सुनाती, लेकिन मैं क्या करता, जब बिना सुने नींद
ही नहीं आती, कई बार इस ज़िद पर बाबूजी से पिट भी जाता, यह और बात माई बाबूजी से
झगड़ बैठती, वैसे मुझे भी समझना चाहिए था, दिन-भर काम से थकी-हारी माई, रोज़ रात में
कथा कैसे सुना सकती है, ऐसे में आजी ही, जो अपने पास ले जाती, और कथा नहीं
जानती तब भी, कुछ जोड़-तोड़ करके सुनाती, जिसके प्रति पहले
तो अरुचि रही, लेकिन जब सोचता कि माई जो
कथा सुनाती है, उसका कोई कहीं
दिखाई नहीं देता

जबकि आजी जो कथा कहती है
उसके लोग गाँव में चलते-फिरते दिखते हैं, यही कारण कि पता नहीं
क्या, धीरे-धीरे आजी की कथा की तरफ़ रुचि बढ़ती गई, और एक दिन, आजी ने एक कथा सुनाई
'एक गाँव में एक भाई ने अपने एक भाई को मरवा दिया, और उसके बच्चे जो बहुत छोटे थे, उनसे
चरवाही करवाता, उनकी माँ से लौंड़ी का काम करवाता, कि एक दिन वह गर्भ से रह गई
और बात जाए न घर से बाहर, उसे घाठी दे नदी में फेंकने का उपाय रचने
लगा, तब तक उसे पता चल गया, तो एक गोतिन ने रात
में ही भगा दिया, एक बनिहार के साथ
और एक बार जो वह

बच्चों से मुँह मोड़, घर
से निकली, दोबारा न लौटी कि कहीं खपा दी गई
कौन जाने', लेकिन यही वह कथा थी, जिस पर बड़ा हुआ तो लिखी पहली
कविता, असल में माई की कथा ऐसी कथा थी, जिसे सुनते-सुनते कहीं खो
जाता, सो जाता, लेकिन आजी की कथा ऐसी, जिसे सुनते अक्सर
सोच में पड़ जाता, आज कह सकता हूँ कि, बनने को
मैं भले जो भी बनता, आजी की
कथा न होती

कवि न होता !