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आजु प्रगटीं राधा जग-पावनि / स्वामी सनातनदेव

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राग विलावल, धमार 20.9.1974

आजु प्रगटीं राधा-जग-पावनि।
भादों सुदी अष्टमी आई, भयो भानु[1] को भाग्य सुहावन॥
लै झारी आये जमुना-तट, लगे नील नीरहिं अवगाहन।
अति उछाह कछु लाहु नयो ही सूचित करत मनहुँ अपनो मन॥1॥
उमँगि-उमँगि अन्हवाय हुलसि हिय लगे भानु महिमा कछु गावन।
बालारुन[2] कों अरघ दान करि कियो विचार जबहि गृह आवन॥2॥
प्रगटे दिन कर देव दिव्य वपु करत दीप्त दिसि-विदिसि सुहावन।
ह्वै प्रसन्न वृषभानु भूपकों दई एक कन्या कमलानन॥3॥
‘लेहु भूप! यह दिव्य बालिका, करहु भरन-पोसन हरसित मन।
है यह परम पुरुष की प्रेयसि, हुइहै यासों गृह तव पावन॥4॥
सबहि भाँति हुइहै समृद्धि अरु पावहुगे जग जस अनपायन।’
ह्वै प्रसन्न बाला लै आये, दई कीर्त्तिदा कर प्रसन्न मन॥5॥
भयो उछाह वाद्य बहु बाजे, लाये लोग विविध पहिरावन।
भानु - भवन में भई बधाई, आई श्री राधा रस-दायिनि॥6॥

शब्दार्थ
  1. वृषभानु
  2. उदय होते हुए सूर्य को