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आज मिली माटी से माटी! / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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आखिर तो उर्वरता की भी अपनी सीमा!
नर हो, चाहे नारी हो, चिकनी माटी हो!
शोणित के परमाणु कहाँ तक लाल रहेंगे-
गुलमुहरो के या अनार के फलों-से, या स्वर्ण उषा-से
चिर तेजोमय, चिर ऊर्जस्वित!
अन्न, फूल, फल पैदा करती हार गई थी-
सदियों तक चिर-युवा धरित्री-
ऋतु-कोपों से, तीक्ष्ण हलों के फालों से हो आहत-जर्जर!
उसे चाहिए थी बस अब तो-
उर्वरतामय खाद-
कि धरती लाख-लाख वर्षों तक पाले
अपने धूल-भरे हीरों को!
पर, यह धरती कितनी विपुला, कितनी गहरी,
औ’ कैसी दुर्भेध्य, अँधेरी!
खाद चाहिए थी बस उसको, दीप्त जवाहर-भस्मी की ही!
तेज हवाओं में, बूँदों में,
मेघों से भी ऊपर से भुरकाई जावे जो जितनी ही,
वह उतनी ही बड़े वेग से
धँस धरती के रोम-रोम में, स्नायु-जाल में
उपजावे तर-गरम वही तासीर जवाहर के शोणित की!
अहा, भस्म वह-
पवन-लहरियों की पाँखों पर चढ़कर फैली दसों दिशा में,
बूँदों की गोदी चढ़ उतरी, प्यार-भरी सतहों में भू की!
(जो कण उछले अम्बर में-हो गये नखत वे!)
महामिलन था!

अब तो खेतों में उपजेंगे रस के मोती,
पन्ने जैसी दूब उगेगी,
पौधों का रस पी चहकेंगे-चंचल पंछी,
ज्वलित जवाहर की साँसों-से!
क्योंकि मिली है अब धरती को नूतन खाद रसायन वाली-
जिसमें भिदी हुई हैं उड़ती कुंकुमाय सुरभित मुसकानें!
और जैठ के अरुणोदय की उषा की कंचन तरुणाई!
दूर अनागत में उलझी-सी, या अटकी-सी
मानव का सुख कल्पित करने वाली आँखों में पलुहाते
नील सपन की झीनी पन्नी,
चरणों की तूफ़ानी गतियों का रिमझिम संगीत सुरीला,
युवा विधुर की सुधियों की सतरंग मादकता,
एकाकार, देश की मिट्टी में होने की पंखिल चाहें!
आज, मिली माटी से माटी!