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आती हैं घड़ियां मिलन की बडे शुभ संयोग से / चित्रभूषण श्रीवास्तव 'विदग्ध'

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खुशी मिलती मन को सबके स्नेह औ सहयोग से
बढ़ा करती दूरियाँ नित द्वेश और वियोग से

फूलो से ले सीख अपनी जिदंगी महकाइये
बाड कांटो की लगाकर चुभन मन बिखराइये
बढती नई पीडायें सूनेपन से औं नये रोग से

अपसी सद्भाव से बढते है मन के हौसले
मन अगर हो निश्कपट तो होते सच्चे फैसले
प्रेम बढता है हमेशा प्रेम के ही प्रयोग से

सच्चाई के रास्ते में आते कई एक विघ्न है
क्योंकि सद्भाव संग शंकाये भी संलग्न है
विघ्न होते कम सदा सबके हो तो सहयोग से

आये शुभ अवसर का सबको लाभ लेना चाहिये
मन के हर कटुता कलुश को त्याग देना चाहिये
सुख नहीं मिलता कभी दुर्भाव के उपयोग से

आती हैं घडियाँ मिलन की शुभ बड़े संयोग से
है अमित सुख शांति सबको स्नेह के उपयोग से