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आदमख़ोर समय में / निदा नवाज़

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पुलवामा के आत्मघाती आतँकी को सम्बोधित

दिन वेलेण्टाइन का था
और माहौल प्यार-ओ-मुहब्बत का
प्रेमी और प्रेमिकाएँ सरशार थीं
एक कोमल सनातन भावना से
पूरे विश्व पर बिखरी थी
लाल-लाल गुलाबों की ख़ुशबू
विश्व का एक पूरा वर्ग
प्रेमवचनों को दोहरा रहा था

तुम नफ़रत की घृणा से लिप्त
मानवता का चराग़ बुझाने पर तुले थे
तुम तुले थे कलँकित करने
मुहब्बत की सारी प्रज्ज्वलित इबारतों को
तुमने मिला दिया आदमख़ोर बारूद
लाल-लाल गुलाबों की ख़ुशबू में
तुमने मिटा दिए सारे प्रेमवचन

बेसहारा कर दिया
लगभग पचास परिवारों को
बुझा दीं उनकी उम्मीदें
मार डाले उनके सपने
एक धमाके के साथ धकेल दिए
अन्धेरों में पचास ऐसे घर
जो ग़रीबी से लड़ रहे थे

बुनियादी ज़रूरतों को जुटाने के लिए
उन्हें कुछ नहीं लेना था
तुम्हारी उस पार की सँकीर्ण सियासत से
कुछ नहीं लेना था
तुम्हारी बोई हुई नफ़रतों की फ़सलों से
उन्हें कुछ नहीं लेना था
इस पार की किसी राजनीति से,
सियासत के किसी षड्यन्त्र से

एक सुरक्षाकर्मी का भला
इन बातों से क्या सरोकार होता है
कि संसद में बैठे
हमारे नेताओं की नीतियाँ क्या हैं
हमारे नेताओं का कॉरपोरेट से क्या रिश्ता है
और इन दोनों की
मीडिया हाउसों से कौन-सी साँठ-गाँठ

उसे सरोकार होता है
तो अपनी ड्यूटी से, अपनी तनख़्वाह से
जिसको वह गिनता रहता है दिन-रात
अपने ख़यालों में, अपने ही आप से बातें करते
और गिनता रहता है दवाइयाँ
अपने बूढ़े बीमार माता-पिता की
गिनता रहता है अपने ख़यालों में
अपने नन्हे बच्चों की क़िताबें
उनकी वर्दी
और ट्यूशन फ़ीस जुटाने के तरीके
वह गिनता रहता है अपनी सभी ज़रूरतें
जिनकी सँख्या हमेशा ज़्यादा होती है
उसकी तनख़्वाह के आँकड़ों से

वह बेचारा कहाँ जानता है
कि उसके शहीद होने के तुरन्त बाद
नीलाम की जाती है उसकी प्रतिष्ठा
उसका बलिदान, उसकी शहादत
सियासत के फ़ासीवादी गलियारों में

उसके शव पर की जाती है राजनीति
लड़े जाते हैं इलेक्शन
उसके ख़ून की एक-एक बून्द से
बटोरे जाते हैं वोट, भरी जाती हैं तिजोरियाँ
ड्रामे रचे जाते हैं बिकी मीडिया के डिबेटों में

इस आदमख़ोर समय में, आदमख़ोर सियासत में
तुम केवल एक प्यादे थे ओ आत्मघाती आतँकी
उस पार के एक और सियासी षड्यन्त्र के
और वे शहीद सुरक्षाकर्मी
इस पार की सियासत के निशाने पर हैं सदैव
कब हमारा महाराजा युद्ध की घोषणा करे
कौन जाने, कौन अनुमान लगाए

हमारी यह गन्दी और आदमख़ोर सियासत
किसी ग़रीब को मारती है आत्मघाती आतँकी बनाकर
तो किसी ग़रीब सुरक्षाकर्मी से बलिदान दिलाकर
और इन सबकी मौत
सियासत और कॉरपोरेट के गलियारों में
इस्तेमाल की जाती है, सेलिब्रेट की जाती है
हर आने वाले इलेक्शन से कुछ समय पहले ।