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आदमी! / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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मांस का एक अदद लोथड़ा,
जिसके पीछे की पूँछ कहीं खिर गई है,
शताब्दियों तक चलते-चलते रगड़ खाते;
आगे जिसके धधकता है-फ्रायड का काम-कार्यालय-
सेक्स सेक्रेटेरिएट
सामने है जिसके-
अँधेरे में कार की चमकती सर्चलाइट-सा
अस्तित्व का केन्द्र-पेट, पेट और केवल पेट!
जिसमें सब भक्ष्य, अभक्ष्य, घूस, साम्राज्य
सब चुपचाप समा जायँ,
और डकार न आये! ऐसा हे यह आदमी।
गिरगिटिया आँखों के ऊपर-
खोपड़ी में भुतही कोठी-
जिसमें भरे हैं मकड़ी के जाले और भुस-
मॉडर्न साइकॉलोजी का मूल्यवान् रॉ मैटीरियल!
निर्वसन, नंग-धड़ंग-सा व जीभ चटकारता-
हाथ में बंदूक लिये चला आ रहा है-
यह बीसवीं सदी का आदमी-
डार्विन का जीवित बनमानुस-
बाईस संस्कृतियों का यह साक्षात् परिपक्व फल!
‘‘पूरे बाट पर सरकावे, बेगा-बेगा बोले’’
लीडर, डिप्लोमैट, एकेडेमिशियन!
कुशाग्र, फुर्तीला और इंटैलिजैंट!