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आदमी केॅ चाहियोॅ जी एकटा मृणाल बाँह / अनिल शंकर झा

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आदमी केॅ चाहियोॅ जी एकटा मृणाल बाँह
उष्ण कटिबंध में जें हिम के समान हो।
जेकरा सें भीतरोॅ के सब दुख कही केॅ जी
दुख के पहाड़ के भी फूलोॅ रं भान हो।
हास परिहास मंे जे मीत के प्रतीत करेॅ
सेज पर कामिनी जे रति के समान हो।
भामिनी हो भाविनी हो प्रीत राग रागिनी हो
अमर अटूट गीत समावेद गान हो॥