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आनी समधन को धर बताओ रे भाई / पँवारी

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पँवारी लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

आनी समधन को धर बताओ रे भाई
जय मऽराऽ जोगी नऽ रयना गवाई।।
टाटी का बंधन तोड़ो रे भाई
जय मऽराऽ जोगी नऽ रयना गवाई।।
ओसरी की खाट हटाओ रे भाई
जय मऽराऽ जोगी नऽ रयना गवाई।।
ओका घरऽ मऽ खाट बिछाओ रे भाई
जय मऽराऽ जोगी नऽ रयना गवाई।।
ओनी समदन को घर बताओ रे भाई
जय मऽराऽ जोगी नऽ रयना गवाई।।