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आपना पति के देखि रोई-रोई बात-करे / महेन्द्र मिश्र

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आपना पति के देखि रोई-रोई बात-करे
अनका पती के देखि हँसेली ठठार के।
माथा खजुआवे बाजूबंद झनकावे अरू
अँखिया लडावे चले छतिया उघार के।
सांस ओ ननद के तऽ रोजे इ उपास राखे
चूल्ही का चलवना से मारे ली भतार के।
कहत महेन्द्र इहें लच्छन करकसा के
भेजेली रसातल ई त ऽ कुल परिवार के।