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आयो सावन मास गगन घन-मण्डलसों छायो / स्वामी सनातनदेव

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ध्वनि व्रज के लोक गीत, कहरवा 26.7.1974

आयो सावन मास गगन घन-मण्डल-सों छायो।
चम-चम चपला चमकि चित्त में चावहुँ उमहायो॥
झूलन को करि मतो सखी सब श्रीजू ढिग आईं।
उनकी अनुमति पाय ललनहूँकों कुंजन लाईं॥
कदम में झूला लटकायो॥1॥
रेसम की वर डोरि जरी सों जगमग मन मोहें।
तापै मलयज[1] पाटि रतनसों खचित सुभग सोहै॥
करि सोरह सिंगार जुगलवर तापै पधराये।
तिनको रूप अनूप देखि रति-रतिपति चकराये॥
निरखि छवि सखि-उर उमहायो॥2॥
रंग-रंग के वसन सखिन के अंग-अंग सोहें।
मणि-मुक्तिनसों जटित आभरन देखत मन मोहें॥
प्रीतिपगीं व्रजवाम स्याम-स्यामा के रस राती।
लगीं झुलावन जुगल तिनहिकी कल की रति गाती॥
सकल जल-थल जनु रस छायो॥3॥
हरे-भरे सब विटप कलित कलरवसों अति सोहें।
भाँति-भाँति के पुहुप मधुप-मण्डित जन-मन-मोहें।
घन-घमण्डसों घिर्यौ गगन रिमझिम-रिमझिम बरसै।
देखि-देखि सो सुखमा अति सखियन को हिय हरसै॥
सकल अग-जग जनु उमहायो॥4॥
नभ में निरखहिं देव हुलसि हिय सुरतरु सुम[2] बरसें।
सिद्ध और मुनि निरखि वेद-धुनि करि-करि अति हरसें॥
खग मृग अरु वनदेव फिरहिं निज-निज मन में फूले।
देखि-देखि यह आनँद सब निज तन-मन हूँ भूले॥
जलद जनु रस ही बरसायो॥5॥

शब्दार्थ
  1. चन्दन
  2. सुमन पुष्प