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आशा / बशीर भद्रवाही

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किसकी मन को लगी
खाने लगीं उम्मीदें
खिड़कियाँ बंद
दरवाज़ों पर हैं ताले लगे
ऐसे में गिरते कभी बर्फ़ के गाले
डरावने बादल लगे घेरने नभ को
मातमी उदासी चाँद पर छाई
तारे डूबे
सर्दी से बर्फ़ अकड़ी
अंदर अँधियारा बाहर भी
हिमानी कोई ले न लपेट में-
उन उम्मीदों-कल्पनाओं को ही
अब तो मातमी वस्त्र पहने जल रहे हैं हसरत में
जिनके अस्थिपिंजर और क़फ़न
दिखाई देने लगे हैं मुझे।