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आशिक़ की भी कटती हैं क्या ख़ूब तरह रातें / सौदा

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आशिक़ की भी कटती हैं क्या ख़ूब तरह रातें
दो चार घड़ी रोना, दो चार घड़ी बातें

मरता हूँ मैं इस दुख से, याद आती हैं वो बातें
क्या दिन वो मुबारक थे, क्या ख़ूब थीं वो रातें

औरों से छुटे दिलबर, दिलदार होवे मेरा
बर हक़ है अगर पीरों, कुछ तुम में करामातें[1]
 
कल लड़ गईं कूचे में आँखों से मेरी आँखें
कुछ ज़ोर ही आपस में दो दो हुई समघातें

इस इश्क़ के कूचे में ज़ाहिद तू सम्भल चलना
कुछ पेश न जावेंगी यहाँ तेरी मनाजातें[2]
 
सौदा को अगर पूछो अहवाल[3] है ये उसका
दो चार घड़ी रोना, दो चार घड़ी बातें

शब्दार्थ
  1. चमत्कार
  2. प्रार्थनाएँ
  3. हाल