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आसमान ख़ुद / भवानीप्रसाद मिश्र
Kavita Kosh से
आसमान खुद
आसमान ख़ुद हवा बनकर
नहीं बहता जैसे
हवा उसमें बहती है
ऐसे जीवन भी
ख़ुद नहीं बन जाता मौत
मौत उसमें रहती है
कहीँ पहले से
और सिर उठाती है फिर
वक़्त पाकर
आसमान में चुप पड़ी हुई
हवा की तरह
आसमान खुद
हवा बनकर नहीं बहता!