भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आह भरते खंडहर में / पंख बिखरे रेत पर / कुमार रवींद्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

फूल भोले
क्या करें अंधे शहर में

एक काली झील में
डूबे रहे दिन
खुशबुओं की बात से
ऊबे रहे दिन

आँख-मूँदे
धूप लौटी दोपहर में

सीढियों पर आहटें हैं
ठोकरों की
चौखटें टूटी हुईं
सारे घरों की

शहद पीते
घोलकर सपने ज़हर में

बंद दरवाजे
हवाओं की तरफ के
कोठरी में कैद
साये हैं बरफ के

गीत
ठंडी आह भरते खण्डहर में