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इक गौहर आँसू का न छोड़ा दिल की जोत जगाने को / ज़ेब गौरी

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इक गौहर[1] आँसू का न छोड़ा दिल की जोत जगाने को ।
याद किसी की ख़ाली कर गई रातों रात ख़ज़ाने को ।

उड़ जाती है गीत सुनाकर जब मुझको कोई चिड़िया,
मैं भी साथ चला जाता हूँ दूर तलक पहुँचाने को ।

अपनी जगह हर लफ़्ज अलामत[2] शेर के तार-ओ-पौद[3] में है,
अलग-अलग करके मत देखो इक-इक ताने-बाने को ।

पत्ते-पत्ते बूटे-बूटे पर लिखा हैनाम उसका,
मैं भी चौरस्ते पे खड़ा हूँ अपना पता बताने को ।

मैं तो रोने हँसने वाला एक तमाशाई हूँ बस,
मुझसे और ता‍अल्लुक़ क्या है 'ज़ेब' मेरे अफ़साने को ।

शब्दार्थ
  1. मोती
  2. प्रतीक
  3. बुनावट