भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

इज़ाडोरा को पढ़ते हुए / मुक्ता

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अपनी दोनों बाहें शून्य में फैलाये
वह नाच रही थी आदिम हवाओं के साथ
मद्धिम रोशनी और नीले पर्दे के कैनवस पर
थाप दे रही थीं उसकी पिंडलियाँ
बारिश की बूँदों में गुन-गुन बढ़ रहे थे उसके पैर
-मानसूनी बादलों और पिघलते आसमानों के पार
नाच रही थी इज़ाडोरा

नाचते-नाचते , एक – एक आवरण उतार रही थी
पेड़ों के, कलियों के और निर्मम काँटों के
वक्ष से हटा रही थी वस्त्र धीरे- धीरे
सुरों से ढँकती जा रही थी उसकी देह
-सफ़ेद पारदर्शी गाउन में गुलाबों से सजी
वह थिरक रही थी।

इज़ाडोरा का नृत्य
आवाज देता था
पृथ्वी को, सागर को
आदि और अंत को
वह खड़ी थी जहाँ
जहाँ कोई नाव नहीं थी
उसके पैर मजबूती से फर्श को छूते थे
बाहें आकाश में कहानी ढूंढती थीं।

मुक्ति दिलाई थी उसने
अपने बच्चे के शवों को धर्म-पुरोहितों से / बेड़ियों से
अग्नि में सौंदर्य को टाँक
दी थी विदाई गूँगी चीख़ों से....
सृजन की अंतिम मातृ- चीत्कार
नाचती रही थी इज़ाडोरा
खाली कमरे में
खाली कमरे की उदास प्रतिध्वनियों को

रोम में फ्रासक्ति से आने वाली बैलगाड़ियों के साथ
फिर से नाच रही थी इज़ाडोरा<ref>इजाडोरा डंकन अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में सन 1878 में जन्मी क्रांतिदर्शी महान नृत्यांगना जिसकी आत्मकथा “My Life”अत्यधिक चचित हुई। </ref>
जुरथ्रुस्त्र की तरह
हाथ में मशाल लिये
नाच रही थी वह
अपोलो<ref>यूनानी देवता सूर्य।</ref>, एफ़्रोदिती<ref>प्राचीन मिस्र सभ्यता में चर्चित अपूर्व सुंदरी साम्राज्ञी।</ref> की आत्माओं के साथ
काले शाल में अपनी सिसकियाँ छिपाये
मेहनतकश सख्त हाथों वाले प्रेमियों के साथ
वह गा रही थी ‘ ट्रेजिक कोरस ‘

बढ़ आया था इतिहास, मिस्र के खंडहर
उसके करीब,
खंडहर के सबसे ऊँचे टीले पर
बाहें फैलाये नाचती वह इज़ाडोरा
बढ़ने लगी सूर्य की ओर....

शब्दार्थ
<references/>