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इन्तसाब / ब्रजेन्द्र 'सागर'

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इन्तसाब[1]

उन सबको
जो माज़ी[2]में जी रहे
हाज़िर[3]को
फ़र्दा[4]की
सौगात हैं
और
तुमको' भी


शब्दार्थ
  1. समर्पण
  2. भूतकाल
  3. वर्तमान
  4. भविष्य