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इन्द्रधनुष झूले / रमेश रंजक

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झील किनारे
पाँव पखारे
सन्ध्या गंध भरी
सूरमुखी देह की छाया लगी सोनमछरी ।

मंजीरे-सी बजीं
चूड़ियाँ हाथें की
जल की
तन-मन पर सिहरी
आलोकित छवि
हल्की-हल्की
जगह-जगह समकोण बनाती दीपशिखा उभरी ।

आदमकद शीशे में
गीले इन्द्रधनुष
झूले
महक गए सीमान्त
स्नेह के फूले-
अनफूले
छाँह पहाड़ी चढ़ी शिरीष पर कंचन की गगरी।