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इन्द्र / रामदेव रघुबीर

इन्द्र राक्षस मारन के,
जूझे दिन अरु रात।
राक्षस जूझे उसी तरह,
इन्द्र से बनै न बात॥

राखी तेरी महिमा न्यारी,
जो जाने होए भवसागर,
पार अति भारी॥

इन्द्र जाए गुरू बृहस् चरण में,
दिहले शीस झुकाए।
जंग में जूझत राक्षस दल से,
उससे पार न पाए॥

कहे इन्द्र अन्तिम जेग में,
गुरू जूझन को हम जाएँगे।
जय ना भया तो लड़ते लड़ते,
अपना भी अन्त मनाएँगे॥