भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

इन दिनों / प्रियंका पण्डित

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बहुत मामूली दोपहरें हैं
इन दिनों मेरे पास
दरवाज़ों पर जो धूप टपकती थी
मायूस-सी चुप खड़ी है
हवाएँ दस्तक देने के पहले ही
बेहद शुष्क हो जाती हैं
शहर तो वैसा ही है
-बीतता हुआ-
कश्मीर की भारी बर्फ़बारी के बाद
हाँ, मौसम थोड़ा ठण्डा होता जा रहा है
मैं बेहद मामूली दोपहरों में बन्द हूँ
तुम कहाँ हो?