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इन विषमता के पलों में, स्वार्थ के इन मरुथलों में / योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’

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इन विषमता के पलों में, स्वार्थ के इन मरुथलों में
नेह के सरसिज उगाएँ, हों सुगन्धित सब दिशाएँ

द्वेष की लू के थपेड़ों से सुमन मुरझा रहे हैं
और कोयल, मोर, बुलबुल भी नहीं कुछ गा रहे हैं
इस घुटन की त्रासदी में, दौड़ती जाती सदी में
प्रश्न के उत्तर सुझाएँ, प्यार को फिर से बुलाएँ

नेह के सरसिज उगाएँ, हों सुगन्धित सब दिशाएँ

अब घृणा वातावरण में हर तरफ फैली हुई है
श्वेत चादर आपसी सदभाव की मैली हुई है
ज़िन्दगी की इस डगर में, मुश्किलों के इस सफ़र में
सब गिले-शिकवे मिटाएँ, दो क़दम आगे बढ़ाएँ

नेह के सरसिज उगाएँ, हों सुगन्धित सब दिशाएँ

भूख, बेकारी, अभावों का घना छाया अँधेरा
दूर तक दिखता नहीं कोई व्यवस्था का सबेरा
रात गहरी हो गई है, चाँदनी भी खो गई है
दीप आशा के जलाएँ, रोशनी से पथ सजाएँ

नेह के सरसिज उगाएँ, हों सुगन्धित सब दिशाएँ