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इस दर्ज़ा हुआ ख़ुश के डरा दिल से बहुत मैं / 'बाकर' मेंहदी

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इस दर्ज़ा हुआ ख़ुश के डरा दिल से बहुत मैं
ख़ुद तोड़ दिया बढ़ के तमन्नाओं का धागा

ता-के न बनूँ फिर कहीं इक बंद-ए-मजबूर
हाँ कैद़-ए-मोहब्बत से यही सोच के भागा

ठोकर जो लगी अपने अज़ाएम ने सँभाला
मैं ने तो कभी कोई सहारा नहीं माँगा

चलता रहा मैं रेत पे प्यासा तन-ए-तन्हा
बहती रही कुछ दूर पे इक प्यार की गंगा

मैं तुझ को मगर जान गया था शम्मा-ए-तमन्ना
समझी थी के जल जाएगा शाएर है पतिंगा

आँखों में अभी तक है ख़ुमार-ए-ग़म-ए-जानाँ
जैसे के कोई ख़्वाब-ए-मोहब्बत से है जागा

जो ख़ुद को बदल देते हैं इस दौर में ‘बाक़िर’
करते हैं हक़ीक़त में वो सोने पे सुहागा