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ईसुरी की फाग-3 / बुन्देली

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

मोरी रजऊ से नौनों को है

डगर चलत मन मोहै

अंग अंग में कोल कोल कें ईसुर रंग भरौ है ।

मन कौ हरन गाल कौ गुदना, तिल सौ तनक धरौ है ।

ईसुर कात उठन जोबन की, विरहा जोर करौ है ।


भावार्थ


मेरी रजऊ से सुन्दर कौन है ? रास्ते चलते मन मोह लेती है । ईश्वर ने उसके अंग अंग को तराश कर रंग भरा है ।

उसके गाल का गुदना छोटे तिल-सा लगता है । देखो, ईसुर ! उभरते यौवन को विरह कैसे सता रहा है ?