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उयि अ‍उ‍र आयिं हम अ‍उ‍र आन / पढ़ीस

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उयि अउर आयिं हम अउर आन!
सोचति समुझति इतने दिन बीते
तहूँ न कहूँ खुलीं आँखी?
काकनि यह बात गाँठि बाँधउ-
उयि अउर आयिं हम अउर आन!
उयि लाट कमहटर के बच्चा,
की संखपतिन के पर-पोता,
उयि धरमधुरंधर के नाती,
दुनिया का बेदु लबेदु पढ़े,
उयि दया करैं तब दानु देयिं,
उयि भीख निकारैं हुकुम करैं,
सब चोर-चोर मौस्यइिति भाई,
तोंदन मा गड़वा हाथी अस-
उयि अउर आयिं हम अउर आन!
उयि बड़े-बड़े महलन ते हँसि-हँसि
लाखन के व्यउहार करैं;
घंटिन ते चपरासी ग्वहरावैं[1]
फाटक पर घंटा बाँधे हैं।
गुरयि उठैं आँखी काढ़े
पदढिट्ठी कै भन्नायि जायँ।
उयि महराजा, महंत दुनिया के
अक्किल वाले ग्यानवान।
अक्किल ते अक्किल काटि देंयि-
उयि अउर आयिं हम अउर आन!
काकनि, तुमार लरिका बिटिया,
छूढ़ा[2] पानी पी हरू जोतैं,
उनके तन ढकर - ढकर चितवैं
बसि कटे पेट पर मुँहुँ बाँधे।
खाली हाथन भुकुरयि लागैं।
उयि राजि रहे उयि गाजि रहे-
उयि अउर आयिं हम अउर आन!
हम लूकन भउकन पाला पथरन
बीनि - बीनि दाना जोरी,
की बड़े-बड़े पुतरी-घर [3] भीतर
मूड़ हँथेरी धरे फिरी ?
चूरै हालीं नस - नस डोली
यी राति दउस की धउँपनि मा,
तब यहै भगति और भलमंसी
हम हरहा गोरू तरे पिसे।
पंचाइति मा तुम पूँछि लेउ-
उयि अउर आयिं हम अउर आन!

शब्दार्थ
  1. पुकारें, बुलावें
  2. खाली, सिर्फ
  3. मिल का भांेपू, साइरन बजने का स्थान