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एक दिन देखकर उदास बहुत / राहत इन्दौरी

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एक दिन देखकर उदास बहुत
आ गए थे वो मेरे पास बहुत ।

ख़ुद से मैं कुछ दिनों से मिल न सका
लोग रहते हैं आस-पास बहुत ।

अब गिरेबाँ बा-दस्त हो जाओ
कर चुके उनसे इल्तेमास[1] बहुत ।

किसने लिक्खा था शहर का नोहा
लोग पढ़कर हुए उदास बहुत ।

अब कहाँ हम-से पीने वाले रहे
एक टेबल पे इक गिलास बहुत ।

तेरे इक ग़म ने रेज़ा-रेज़ा किया
वर्ना हम भी थे ग़म-श्नास बहुत ।

कौन छाने लुगात[2] का दरिया
आप का एक इक्तेबास[3] बहुत ।

ज़ख़्म की ओढ़नी, लहू की कमीज़
तन सलामत रहे लिबास बहुत ।

शब्दार्थ
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