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एक माय का पाँची ही पूतां / मालवी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

एक माय का पाँची ही पूतां
पांची का मता जुदा-जुदा
पेलो पंडित के, में कासीजी जाऊँ
गंगा में न्हाऊँ, बिस्वनाथ भेंटूं
जेका धरम से में उद्धरूँ
दूसरो पंडित के में उज्जण जाऊँ
अवंती में न्हाऊँ, महाकाल भेंटूं
जेका धरम से में उद्धरूँ
तीसरो के में बाग लगाऊँ
तुलसा परणाऊँ, बामण जिमाऊँ
जेका धरम से में उद्धरूँ
चौथे पंडित के में बेण परणाऊँ
भाणेज परणाऊँ, जात जिमाऊँ
जेका धरम से में उद्धरूँ
पांचवों पंडित कईये नी जाणे
पेट भरी ने धंदो करूँ
हर-हर जिवड़ा तू रयो रे उदासी
रयो रे लुभासी
बरत न कियो रे एकादशी
बरत एकादशी, धरम दुवादसी
तीरथ बड़ो रे बनारसी
एकादशी ना डाड़े जीमे छें थूली
अंतकाल प्रभु मारग भूली
एकादशी ना डाड़े जीमे छे खिचड़ी
अंतकाल प्रभु मेले बिछड़ी
एकादशी ना डाड़े पोड़े-ढोले
अंतकाल प्रभु अवगत डोले
व्दासी ना डाड़े जीमे छे भाजी
अंतकाल प्रभु नइ्र छे राजी
व्दासी ना डाड़े जीमे छे कांसे
अंतकाल प्रभु मेले सांसे
व्दासी ना प्रभु डाड़े जीमे छे चोखा
अंतकाल प्रभु मारग सीधा
घी बिना धरम ना होय हो पंडित जी
पत्र बिना कुल ना उद्धरे
घृत बिना होम ना होय हो पंडित जी
तिल बिन ग्यारी न होय
मीरा के प्रभु गिरधर नागर
हरि चरणा चित लागी