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एक मुक्तक-शिशु के निधन पर / लाखन सिंह भदौरिया

कविता का शैशव, किशोर होता जाता था।
मीरा के दृग से, कबीर रोता जाता था।
पीर की उषा मुस्कुराई ‘शिशु’ के आनन पर-
पौ फटती जाती थी, भोर होता जाता था।