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एगारमॅ सर्ग / उर्ध्वरेता / सुमन सूरो

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कुछ राजपुरुष साथें लेॅ केॅ पहुँचो गेलै,
सारथी सहित, यमुना पारें युवराज वहाँ।
योजनगंधा के साथ निवास करै छेलै,
धरमारथ में लौलीनॅ धौवरराज जहाँ।

मचलै भारी खलबली समूचे बस्ती में,
दौड़ो केॅ ऐलै लोगबाग अगवानी में।
सरधा आदर के भाव उमड़लै ज्वारॅ रं;
मानॅ जे सहज सुभावॅ के थिर पानी में।

सबकेॅ देलकै आसन निषाद् राजें हुलसी,
मानी केॅ जीवन धन्य-सुफल, सत्कारॅ सें;
स्वागत के सभे विधान पुरैला के बाद;
करजोड़ी केॅ पूछलकै नाति-बिचारॅ सें।

”शबरी घर राम पधारै के कारण बोलॅ,
बोलॅ कारण हमरॅ सौभाग्य बढ़ाबै के।
हमरॅ जिनगी के घड़ो आय सबमें सुन्दर;
मौका मिललॅ छेॅ सेवा-फूल चढ़ाबै के।

जें रथ में जोरै एक साथ अर्वत-वाजिन्,
वै रथी धुरन्धर देवव्रत गंगा-नन्दन।
के गोड़ यहाँ पड़लॅ छै, माटी सिक्त आय;
यै बस्ती के धुरदा-धुरदा बनलै चन्दन।

बोली उठलै युवराज विनय के भावॅ सें-
”बस महीयसी योजनगंधा के हाथ मिलेॅ;
छ रिक्त मुकुट-सिंहासन जे साम्राज्ञी के;
ऊ भर, पिता केॅ जीवन-साथी साथ मिलेॅ।“

”छै तीन लोक में ऐहनॅ जें आन करेॅ,
इच्छित पाबै में महाबली युवराजॅ केॅ
लेकिन मन के सब बात कहै लेली निर्भय;
जें खुद करने छे, दुर्बल-डरू समाजॅ केॅ।

हुनका आगूँ सच बोलै में संकोच कहाँ?
खुद महाराज ने योजनगंधा पाबै लेॅ।
करने छेलै प्रस्ताव यहाँ पर आबी केॅ;
यै ‘गुरुवा’ केॅ जीवन संगिनी बनाबै लेॅ।

पर पिता हृदय के जे छेकै दायित्व बोध,
वें चाहै छै सुखमय भविष्य संतानॅ के।
बस शर्त्त यही लेॅ राखलियै हुनका आगूँ,
सच बोली देलियै बात मनॅ के, आनॅ के।

भै गेलै विदा तुरत कुछ कहने बिना हुनी,
मुरझैलॅ मन सें, डूबलॅ गहन निराशा में।“
”की शर्त्त! बताय दियै हमरा“-बोली उठलै;
युवराज तुरत उत्साहित मन के भाषा में।

”योजनगंधा के बेटा; हमरॅ नाती केॅ,
राजा बादें हस्तिनापुरी के राज मिलेॅ।
नै हिचक तनी-सा भी भेजै में साथ-साथ;
जों शर्त्त हुअेॅ मंजूर; वचन जों आज मिलेॅ।“

युवराजें ने देखलकै राज-समाजॅ केॅ,
मुरझैलै जे धीवरराजॅ के बातॅ सें।
चेहरा-चेहरा पर एक नकार उगी गेलै,
सहमी उठलै सौंसे समाज ब्याघातें सें।

आसन छोड़ी संकल्पितमन उठलै करिवर,
”मंजूर शर्त्त“-गूँजो उठलै आकाशॅ में।
”राजा होतै योजनगंधा के बेटा हो;
ई ब्रह्मलकीर अमिट रहतै इतिहासॅ में।

”पर एक बात आरो-युवराजें वचन भंग,
करतै ने हमरा एकरॅ अटल भरोसॅ छै।
लेकिन हुनकॅ संतान अडिग रहतै की नै;
यै बातॅ के आश्वासन-कोन भरोसॅ छै?”

तमकी उठलै सब राज समाजॅ के चेहरा,
बुढ़बा के स्वारथ सें भरलॅ हठधर्मी पर।
भय सें कम्पित, लेकिन चुपचाप रही गेलै;
कुढलॅ-कुढ़लॅ, युवराजॅ के सतकर्मी पर।

ताकलकै देवव्रत ने दूर अकाशॅ केॅ-
”सुरजें ने छोड़ौ दियेॅ पूब में उगबॅ जों।
चाने ने छोड़ी दियेॅ पूर्णिमा राती केॅ,
घी ने छोड़ेॅ जग्गो-आगिन में जरबॅ जों।

तैय्यो हमरॅ नै वचनभंग होतै हैकहियो,
लेकिन तोरॅ शंका निर्मूल बनाबै लेॅ।
हे धीवरराज! भरोसॅ तोरॅ प्राणॅ केॅ;
दायित्वबोध केॅ चिर संतोष दिलाबै लेॅ।

ऊ बात कहै छीं आय, कहीं जेकरॅ मिशाल,
ने आदिकाल सें छै कोनो इतिहासॅ में।
आरो भविष्य में नै मिलतै यै धरती पर;
बसलॅ रहतै युग-युग सबके विश्वासॅ में।

देवता-पितर नक्षत्र -अचेतन-पंचभूत,
यै सभाबीच जुटलॅ नर-नारी के समाज।
ग्रहपिण्ड! पूर्ण ब्रह्माण्ड! कान खोलॅ सबने;
हमरॅ ई भीषण प्रण ध्यानॅ सें सुनॅ आज-

आझू सें हमरॅ नाँव ‘उर्ध्वरेता’ रहतै,
आजन्म कुमारॅ रही बितैबै ई जीवन।
संतानहीन रहथौं तरबै पुङ्नाम नरक;
रक्षा करबै बस, अपनैबै नै सिंहासन।

सबदिन करबै सम्मान यथोचित राजा के,
देखी केॅ ओकरा में श्रद्धेय पिता-छाया।
हस्तिनापुरी के राजमुकुट केॅ जिनगोभर;
बूझी केॅ कुल के मान भरत-कुल के काया।

मचलै कुहराम दशोदिश भीष्म प्रतिज्ञा सें,
फूलँ के झैरी सें सुनसान भरी गेलै।
बस, ”धन्य-धन्य’ के रोर महत् आकाशॅ में;
बढ़लै तीनों लोकॅ केॅ पार करी गेलै।

पहर-पहर बदलै छै नाम - रूप सुरजॅ के,
बाल अरुण होय उठलै अंशुमान।
गत होलै देवव्रत, लोक-लोक मानस में;
चमकै छै ‘भीष्म’ बनी वर्त्तमान।

आजीवन ब्रह्मचर्य पालन के व्रत अजगुत,
निभना नै संभव बिन ब्रह्मज्ञान।
बनवासी सन्यासी-मुनि खातिर कठिन काज;
गृहवासीं करतै की समाधान

अतरज छै लोगॅ में जन-जन में चर्चा छै,
तड़तड़ जुआनी के मूर्त्तिमान।
भीष्मॅ के प्रण-त्यागें झकझोरी देने छै;
ओर-छोर मर्त्तलोक आसमान।