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एहिं सों सरस्वती प्रयाग / सरहपा

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एहिं सों सरस्वती प्रयाग, एहिं सो गंगासागर।
वाराणसी, प्रयाग, एहिं सो चंद्र-दिवाकर।
क्षेत्र पीठ उपपीठ एहिं, मैं भ्रमेऊँ समिस्थउ।
देह सदृश तीर्थ, मैं सुनेउँ न देदेउँ।
सर पुरइणि दल कमल, गंध केसर वर नालें।
छाड़हु द्वैत न करहु से, ना लागह मढ़ आले।
कामंत शांत क्षय जाय, अत्र पूजहु कुल हीनहु।
ब्रह्मा-विष्णु त्रिलोचन, जहँ जाय विलीनहु।
यदि नहिं विषयहि लीलियइ, तो बद्धत्व न केहि।
सेतुरहित नव अंकुरहि, तरुसंपत्ति न जेहि।
जहँ तहँ जैसेउ तैसेउ, येन तेन भा बुद्ध।
स्वसंकल्पे नाशिअउ, जगत् स्वभावहि शुद्ध।
सहज कल्प परे द्वैत ठिउ, सहज लेहु रे शुद्ध।
काय पग पाणि पीस लेउ, राजहंस जिमि दुष्ट।