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ऐंगी-ढेंगी / कुमार वीरेन्द्र

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झूम रही थी बुनी, झुमा रही थी बुनी
आँगन में रे पानी लहरा रही थी बुनी

और चिरइयाँ थीं
रामजी की चिरइयाँ, जो ढूँढ़ रही थीं चाउर
कि कुछुओ आउर; मनेमन धो रही थीं मन, धो रही थीं तन; भीरी जाने को दौड़ता
फुर्र से इस कोन, फुर्र-फुर्र उस कोन, कबहुँ केने तो उड़ जातीं, केने से तो उड़-उड़
आतीं, कहता कइसे, रह-रह चह-चह करतीं, तनि फुरफुरा चोंच
से चोंच जुड़ा, का बूझे केहू बात कवन, तबहुँ
कहाँ माननेवाला, जो कहन थी
बड़ी गहन थी

'देखो, एगो बात सुनो, रामजी से कहना, हमरी आजी नू

बखार नाहीं भीगे
तसला-कठवत लगा, रातभर जागती है
पानी फेंकती है, एतना पइसा दें, छप्परी छवा जाए; कहना, हमार धँवरा बैला, जब से मू गया
बाबा फिकिरे, बाग में मचान पर बैठे रहते हैं, अबकी मेला में एगो कसहुँ कीना जाए, खेतिया
ना होई खाएँगे का; कहना, हमरे गाँव में बहुते हो गए हैं चोर, खुरुखुरु हो
तनिको, माई जाग जाती है, फिर ऊँघी आती ही नाहीं
अउर काल्ह नू, ऊ जो काकी है न, उसकी
बकरिया को साँप काट दिया
देखो, हमर नाम

भोलेबाबा है, बाकी सँपवा बतिया सुनते ही नाहीं, कहना

हम कहें त सुनें
केहू को काटे नाहीं; अब, तुमही बताओ, का
जाऊँ इस्कूल, हिसाब ना आवे तो माहटर साहेब, जब-तब मार देते हैं, बताना, उनको तनि बुद्धि
दे दें; अउर देखो, पहिले मैं मारामारी नाहीं करता, तबहुँ पिटवाने को, सब हमरे नाम लगा देते हैं
तनि पूछ के आना तो मैं अब का करूँ, कहँवा जाऊँ; सुनो, हमरी जो नानी
है न, बीड़ी पीती है, छोड़ती ही नाहीं, कथा कहते खोंखने
लगती है, माई के बाद, एगो उहे है, जो गाके
सुनाती है, कहना, सपने में
आ समझाएँ

हमरी बात तो 'बुढ़ऊ नतिया' कह, टरका देती है, पूछना

लोग झूठ काहे
बोलते हैं, पानी पर चलेवाला पँवरिया
पिलुआ जो पिए, पँवरना आ जाए, कहँवा आया, डूब ही गया संगतिया, जताना
दुखी हूँ, जहँवा गाड़ा गया, जामुन का बीया छींट दिया है बड़हन होगा, अँकवारी
भरूँगा रोज, सुनो, ए रामजी की चिरइयाँ, जो कहा सो कहना
बिसरना ना बिसरने देना, नाहीं तो जानती ही हो
हमरी आजी को, तोहे तो दु-चार
दाना छींट देगी, बाकी
ऊ तोहरे

जो रामजी, किए जो जादा ऐंगी-ढेंगी, अउर
भेंटा गए, कबहुँ कतहुँ, मार मूसर मार मूसर

पूजा करेगी !'