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ओ इक्कीसवीं सदी के मनुष्य / सुनील गंगोपाध्याय

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ओ इक्कीसवीं सदी के मनुष्य!
तुम्हारे लिए प्रार्थना करता हू
चंचल सुख और समृद्धि की,
तुम अपने जीवन और जीवनयापन में मज़ाकिया बने रहना
तुम लाना आसमान से मुक्ति-फल --
जिसका रंग सुनहरा हो,
लाना -- ख़ून से धुली हुई फ़सलें
पैरों-तले की ज़मीन से,
तुम लोग नदियों को रखना स्रोतस्विनी
कुल-प्लाविनी रखना नारियों को,
तुम्हारी संगिनियां हमारी नारियों की तरह
प्यार को पहचानने में भूल न करें,
उपद्रवों से मुक्त, खुले रहें तुम्हारे छापेख़ाने
तुम्हारे समय के लोग मात्र बेहतर स्वास्थ्य के लिए
उपवार किया करें माह में एक दिन,
तुम लोग पोंछ देना संख्याओं को
ताकि तुम्हें नहीं रखना पड़े बिजली का हिसाब
कोयले-जैसी काले रंग की चीज़
तुम सोने के कमरे में चर्चा में मत लाना
तुम्हारे घर में आए गुलाब-गंधमय शान्ति,
तुम लोग सारी रात घर के बाहर घूमो-फिरो।
ओ इक्कीसवीं सदी के मनुष्य!
आत्म-प्रताड़नाहीन भाषा में पवित्र हों
तुम्हारे हृदय,
तुम लोग निष्पाप हवा में आचमन कर रमे रहो
कुंठाहीन सहवास में।
तुम लोग पाताल-ट्रेन में बैठकर
नियमित रूप से
स्वर्ग आया-जाया करो।

मूल बंगला से अनुवाद : उत्पल बैनर्जी