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कंटीली झाड़ियाँ / निदा नवाज़

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तुमने हमारे खेतों में
कंटीली झाड़ियाँ उगानी चाहीं
कि वह हमारे
सारे विवेक धरातल पर
फैल जाएँ
और हमारे विचारों के पग
जहाँ भी जाना चाहें
घायल होकर वापस आएं
तुमने सींचना चाहा
इन कंटीली झाड़ियों को
हमारे ह्ज़ारों बच्चों के
ताज़ा-ताज़ा ख़ून से
लेकिन
अब तुम ने देखा कि
हमारे उज्ज्वल विचारों की
धूप पड़ते ही
तुम्हारी ये कंटीली झाड़ियाँ
मुरझा गई हैं
काश, तुमने सोचा होता
कि ये काले बारूद की
कंटीली झाड़ियाँ
केवल काले विचारों की
बांझ धरती में ही
पनपती हैं
और हमारी धरती
लल्लेश्वरी के शैव-दर्शन
और नुन्द ऋषि के ऋषि–दर्शन
का प्यारा संगम
इस धरती की झीलों में
कमल के फूल खिलते हैं
जो दृढ़ वैराग्य हैं
हमारे चरित्र के प्रतीक
देवी-देवताओं के आसन
इस धरती के अंग अंग में
उस केसर की सुगन्ध है
जो गुरुओं का न्यारा रंग है
और जिसका तिलक
दिव्य नेत्र को भी
आकार बख़्शता है
हमारी धरती चिनार के वृक्ष
उगाती है
जिनकी हरित-शीत छाँव में
मन को शान्ति मिलती है
हम तुम्हारी इन कंटीली झाड़ियों को
जड़ से उखाड़ देंगे
अब पूरे संसार को
आतंक की इन
कंटीली झाड़ियों की नहीं
बल्कि शान्ति के महकते
फूलों की ज़रूरत है