भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  रंगोली
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

कठिन करेजौ जो न करक्यौ बियोग होत / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कठिन करेजौ जो न करक्यौ बियोग होत
तापर तिहारौ जंत्र मंत्र खंचिहै नहीं ।
कहै रतनाकर जरी हैं बिरहानल मैं
ब्रह्म की हमारैं जिय जोति जंचिहै नहीं॥
ऊधौ ज्ञान-भान की प्रभानि ब्रजचन्द बिना
चहकि चकोर चित चोपि नचिहै नहीं ।
स्याम-रंग-रांचे साँचे हिय हम ग्वारिनि कै
जोग की भगौंहीं भेष-रेख रंचिहै नहीं ॥55॥