भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कनाट सर्कस / मनोज श्रीवास्तव

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कनाट सरकस

कनाट सरकस--
अर्थात,
इन्द्रजालीय मार्गों के फंदे में
सर का कस जाना...

रतियोगियों की सिद्ध-भूमि है यह
जहां रतियोग की कामना में दत्तचित्त
विन्डोशापिंग के बहाने परिक्रमारत
नितम्बों पर बकुल-ध्यान लगाए,
--किसी पर्वतवासिनी देवी के दर्शनार्थ
  पर्वतारोहण करने के अंदाज़ में
  चलते जाना, चढ़ते जाना
  चढ़ते ही जाना, चलते ही जाना
  साधक आवेश में--अथक, अविराम...

परमात्मा से कातर याचना करते हुए
आज की साधना का सुफल,
पर, इच्छित के पर-पुरुष-संग
ह्रदय-विदारक सुदूर कार-गमन पर
ईश्वर को भरपूर कोसते हुए
हाथ मल-मल, रोते और पछताते हुए,
फिर, बिखरे मनोयोग बटोरकर
मध्यस्थ कामिनी-हाट लगे पार्क में
एक सुविधाजनक कोने में
जम जाना, पसर जाना
--टकटकी लगाए हुए
  इतरगंध-प्रसारक देहों पर...