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कन्याकुमारी का समुद्र / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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प्राण की सौ-सौ उछालों की पटलियों से तरंगित-
नील जरतारी पहन कर रेशमी लहँगा,
ठुमक कर नाचती यह
सिन्धु-कन्या इस विजन में!

साँस में है अमर नील विषाद,
चरण में है मधुर किंकिणि-नाद;
चल रहे हैं वन्दना के स्वर सुगन्धित;
भुज-लताएँ मृदुलतम लहरा रही हैं।
हाथ में सन्ध्या-उषा के ज्वलित कुंकुम-थाल,
स्वप्न-विजड़ित कर्णचुम्बी पलक मदिर विशाल!

रूप का बल सह न पायेगी
सुकोमल कंचना काया-
कि जिसमें ज्वार जोबन का-
बिना तिथि-वार भर आया!