भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  रंगोली
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

कब चुकबे, कब चुकबे चलनी कै गोंहुआँ हो न / अवधी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

कब चुकबे, कब चुकबे चलनी कै गोंहुआँ हो न।
मोरा बीरन भइया आये अनवइया हो न।।
बैइठहु न मोरे भइया रतनी पलँगिया हो न।
बहिनी कहि जाऊ आपन हवलिया हो न।।

नौ मन कूट्यों भइया नौ मन पीस्यों हो न।
भइया पहिली टिकरिया मोर भोजनवा हो न।।
भइया वोहू महैं कुकरा बिलरिया हो न।।
भइया वोहू महैं गोरू चरवहवा हो न।।
भइया वोहू महैं देवरा कलेवना हो न।।
भइया वोहू महैं ननदी कलेवना हो न।।

फटही लुगरिया भइया हमरा पखरुआ हो न।
भइया वोहू महैं गोरू चरवहवा हो न।।
भइया वोहू महैं ननदी ओढनिया हो न।।
भइया वोहू महैं देवरा भगइया हो न।।

ई दुख जिन कह्या बाबा के अगवा हो न।
भइया सभवा बइठ बाबा रोइहैं हो न।।
ई दुख जिन कह्या माई के अगवा हो न।
भइया मचिया बइठ माई रोइहैं हो न।।
ई दुख जिन कह्या सखिया के अगवा हो न।
भइया खेलतै खेलत सखियाँ रोइहैं हो न।।
ई दुख जिन कह्या बहिनी के अगवा हो न।
भइया इहै सुनि गवने न जइहैं हो न।।
ई दुख जिन कह्या भाभी के अगवा हो न।
भइया राम रसोइयाँ तनवा मरिहैं हो न।।
ई दुख कह्या भइया अगुआ के अगवा हो न।
भइया जेन कीहें मोरी अगुअइया हो न।।