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कभी न बेचो ज़मीर अपना कभी तो मेहनत असर करेगी / सुनीता पाण्डेय 'सुरभि'

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कभी न बेचो ज़मीर अपना कभी तो मेहनत असर करेगी।
रखो मुहब्बत सदाक़तों से इन्हीं की चाहत असर करेगी।

मैं माँगती हूँ खुदा से तुझको यक़ीन है तू मिलेगा मुझको-
कि इक न इक दिन तो तेरे दिल पर मेरी मुहब्बत असर करेगी।

न जीत होगी अदावतों की, तू मेरा है, तू रहेगा मेरा-
मेरी मुहब्बत में है सदाक़त मेरी सदाक़त असर करेगी।

ये इश्क़ क्या है समझ ही लेंगे सब इसकी सारी हक़ीक़तों को-
लिखी है जो खूने-दिल से हमने यही इबारत असर करेगी।

जो गुफ्तगू में हों तल्खियाँ तो बुराइयाँ-ही-बुराइयाँ हैं-
अगरचे लहजे में हो मुहब्बत तभी मुहब्बत असर करेगी।