कभी मिलते थे वो हम से ज़माना याद आता है / 'निज़ाम' रामपुरी
कभी मिलते थे वो हम से ज़माना याद आता है
बदल कर वज़ा छुप कर शब को आना याद आता है
वो बातें भोली और वो शोख़ी नाज़ ओ ग़म्जे़ की
वो हँस हँस कर तेरा मुझ को रूलाना याद आता है
गले मे डाल कर बाहें वो लब से लब मिला देना
फिर अपने हाथ से साग़र पिलाना याद आता है
बदलना करवट और तकिया मेरे पहलू में रख देना
वो सोना आप और मेरा जगाना याद आता है
वो सीधी उल्टी इक इक मुँह में सौ सौ मुझ को कह जाना
दम-ए-बोसा वो तेरा रूठ जाना याद आता है
तसल्ली को दिल-ए-बेताब की मेरी दम-ए-रूख़्सत
नई कसमें वो झूटी झूटी खाना याद आता है
वो रश्क-ए-ग़ैर पर रो रो के हिचकी मेरी बाँध जाना
फ़रेबों से वो तेरा शक मिटाना याद आता है
वो मेरा चौंक चौंक उठना सहर के ग़म से और तेरा
लगा कर अपने सीना से सुलाना याद आता है
कभी कुछ कह के वो मुझ को रूलाना उस सितम-गर का
फिर आँखें नीची कर के मुस्कुराना याद आता है