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कमबख़त ये ख्व़ाब / सरोज सिंह

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किसी बड़े पत्थर को
यक़-ब-यक़ उठाने से
उसके भीतर पल रहे
क़िस्म-क़िस्म के कीड़े मकोड़ों की
दुनिया आबाद नज़र आती है
जिनपर रौशनी के पड़ते ही
अफ़रा तफ़री मच जाती है
रौशनी की किरन जानलेवा जान पड़ती है उन्हें
वे एक पल को भी टिक नहीं पाते
ढूंढ लेते हैं कोई और नम आलूद तह आसरे के लिए l
ये ज़रूरी नहीं के रौशनी हर किसी के लिए सवेरा ही हो
कभी-कभो हम धंस जाते हैं धूप के दल-दल में भी
धनक के साए में भी ज़िन्दगी बेरंग सी दिखती है l
और अँधेरे...
अँधेरे वो ख्वाब दिखला जाते हैं
जिसमें हसरतों की प्यास बुझ जाती है
पर कमबख़त, ये ख्व़ाब
बंद आँखों में ही पलते हैं
और ज़िन्दगी
ज़िन्दगी खुली आँखों में ही गुज़र हो सकती है!