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करिया बर कुसुन्नर, धिआ के अँगूठा छूऐ हे / अंगिका लोकगीत

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

वेदिका पर वर-कन्या को बैठाकर इस विधि को संपन्न किया जाता है। कन्या की ओर नाइन बैठती है। नाइन लोढ़े पर कन्या का अँगूठा रखती है। वर उसे पाँच बार उतारता है। इस विधि में वर द्वारा कन्या के पैर का स्पर्श कराकर वर का मजाक उड़ाया जाता है। कहीं-कहीं वर कन्या के अँगूठे का स्पर्श नहीं करता। तब यह विधि दूसरे के द्वारा संपन्न करा दी जाती है। इस विधि को संपन्न करते समय गाये जाने वाले इस गीत में दुलहे की कुरूपता और उसकी हीनता का उल्लेख करके उससे परिहास किया गया है।

करिया बर कुसुन्नर[1], धिआ के अँगूठा छूऐ हे।
बाबा हो तोहें कवन बाबा, तोहें जतिया गँमवल्ह[2] हे।
ताहें टकबा गँमवल्ह हे।

शब्दार्थ
  1. कुरूप
  2. गँवाया