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कर रहे हैं सब हरे पत्ते इसे महसूस / विनय कुमार

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कर रहे हैं सब हरे पत्ते इसे महसूस।
हो गया है आजकल सूरज बड़ा कंजूस।

याद के कोठार में भरिये गुलाबी धूप
फ़िऱ न आएगी शहर में यह सहर मानूस।

छत बमुश्किल सह रही होगी हवा का बोझ
आपका प्रस्ताव है हम टाँग दें फ़ानूस।

मुल्क में जनतंत्र का कुछ तो भरम रखिए
नरक में बनवाइयेगा तख़्त-ए-ताऊस।

राहगीरों के सिकुड़ते जा रहे हैं पाँव
ग्लैशियर-दर-ग्लैशियर पर्वत हुआ है पूस।

दीजिए पोशाक पत्थर की मकानों को
आग पर मरने लगी है यह निगोड़ी फूस।

अब ग़ज़ल के शेर शेरों की तरह खुर
जो नरम दीखें समिझए हैं घुटे जासूस।

साँस वाले आपसे रखते नहीं उम्मीद
मुंतज़िर मुर्दें बिचारे थे हुए मायूस।

हक़ जता कर तोड़ ले या तू लगा ले पेड़
तू न कुत्तों की तरह जूठी गुठलियाँ चूस।